फ़रीदा ने पहले ग्राहक से पैसे माँगते समय टिफ़िन का ढक्कन तीन बार बंद किया।
“महीने के अंत में दे दूँगा,” ग्राहक ने कहा।
वह सिर हिलाने लगी थी, फिर रुकी। “पहले हफ़्ते का हिसाब रविवार को करेंगे।”
घर लौटकर उसने माँ को यह बात बताई। माँ ने बस पूछा, “ढक्कन ठीक था न?”
इकतीस साल की फ़रीदा दूसरों की रसोइयों में बारह साल से काम कर रही थी। दाल कम हो तो पानी कितना बढ़ाना है, उसे पता था। लेकिन अपने खाने की कीमत तय करते हुए वह हर चीज़ घटा देती: गैस का खर्च, मसाले का खर्च, अपना समय।
छोटी बहन नजमा ने उसकी कॉपी देखी और नीचे लिखा: तुम्हारी मेहनत — शून्य।
फ़रीदा ने पन्ना पलट दिया।
जिस घर में वह सुबह का खाना बनाती थी, वह परिवार दूसरे शहर जा रहा था। तीन हज़ार रुपये की जगह खाली होने वाली थी। नजमा ने पूछा कि आसपास अकेले रहने वालों के लिए टिफ़िन क्यों नहीं शुरू करती। पाँच ग्राहक भी मिले तो कुछ सहारा होगा।
फ़रीदा को विचार अच्छा लगा। रास्ता नहीं लगा।
कंधे पर टिफ़िन रखकर दो किलोमीटर चलना संभव नहीं था। साइकिल वह चला लेती थी, मगर गर्म दाल के डिब्बे लटकाकर नहीं। पड़ोस के कबाड़ी के पास छोटा ठेला खड़ा था। सात हज़ार माँग रहा था। मोलभाव के बाद चार हज़ार आठ सौ पर आया।
माँ ने अपनी पुरानी सिलाई मशीन बेचने की बात सुनी तो सूई निकालकर डिब्बे में रख दी।
“इसे रहने दो।”
“चलती भी तो नहीं।”
“इसलिए?”
फ़रीदा ने आगे कुछ नहीं कहा। उस रात माँ ने मशीन की धूल साफ़ की। सुबह वह फिर वैसी ही थी, पर उसके ऊपर रखा अख़बार नया था।
ठेले के पैसे फ़रीदा ने बचत से दिए। चूल्हे की मरम्मत के लिए रखे पैसे भी लग गए। नजमा ने कहा कि खरीदने से पहले किसी से दिखवा ले। फ़रीदा को लगा, फिर कोई कहेगा कि वह यह काम नहीं कर पाएगी। उसने ठेला खरीद लिया।
पहले दिन नौ टिफ़िन तैयार हुए। आलू-मटर, दाल, चार रोटियाँ। फ़रीदा ने डिब्बे इतने कसकर रखे कि उनके बीच हवा भी नहीं बची। गली के मोड़ तक सब ठीक था। मुख्य सड़क पर बायाँ पहिया हिलने लगा।
उसे लगा भार बराबर नहीं है। उसने डिब्बे बदले। अगले मोड़ पर पहिया टेढ़ा हुआ और ठेला एक तरफ़ बैठ गया।
दाल का पीला पानी सड़क की धूल में बहने लगा।
दो टिफ़िन बच गए थे। फ़रीदा ने फोन पर सबको बताया कि आज खाना नहीं पहुँच पाएगा। एक आदमी ने कहा, “रहने दीजिए, मैं बाहर खा लूँगा।” दूसरे ने पूछा कि रोज़ ऐसा तो नहीं होगा।
घर आकर उसने ठेला दीवार से लगाकर ढक दिया।
माँ ने पूछा, “चोट?”
फ़रीदा ने सिर हिलाया।
“तो हाथ धो लो। पहले कुछ खा लो।”
उस शाम फ़रीदा ने नजमा से कहा कि नंबरों वाली पर्चियाँ फाड़ दे। नजमा ने नहीं फाड़ीं। उसने बस कॉपी में ठेले के सामने चार हज़ार आठ सौ लिखा और नीचे एक खाली पंक्ति छोड़ दी।
अगली सुबह फ़रीदा ठेला घसीटकर मरम्मत की दुकान तक ले गई। मिस्त्री ने पहिया निकाला। पहिए की बुश घिस चुकी थी; ऊपर नया रंग था। मरम्मत के नौ सौ रुपये लगेंगे।
“इतने में तो नया पहिया—”
“नया पहिया चौदह सौ का है।”
वह चुप हो गई।
मिस्त्री काम करता रहा। फ़रीदा ने देखा कि धुरी पर वजन डालते समय वह पहले नीचे लकड़ी टिकाता है। उसने पूछा कि रास्ते में फिर हुआ तो क्या करे। उसने दो चीज़ें दिखाईं और कहा कि रोज़ निकलने से पहले पहियों को हिलाकर देख लिया करे।
इस बार फ़रीदा ने बिना शर्माए दोबारा पूछा।
पैसे कम पड़े तो उसने नया ढक्कन खरीदना टाल दिया। बचे हुए डिब्बे माँ ने साबुन से धोकर अलग रखे। मशीन अब भी अपनी जगह थी। उसकी जरूरत ठेले के लिए नहीं पड़ी।
काम दोबारा शुरू करने से पहले फ़रीदा ने पानी से भरे टिफ़िन रखकर रास्ता तय किया। नजमा साथ चली और घड़ी देखती रही। पुल वाली चढ़ाई पर दोनों को ठेला धकेलना पड़ा।
“यह ग्राहक छोड़ना पड़ेगा,” नजमा ने कहा।
फ़रीदा ने विरोध किया। वह शुरुआती ग्राहकों में से एक था।
“एक टिफ़िन के लिए बाकी सब देर से मिलेंगे।”
तीसरी बार चढ़ाई पर रुकने के बाद फ़रीदा ने उसकी बात मान ली। ग्राहक को मना करते हुए आवाज़ काँपी, मगर उसने कोई झूठा बहाना नहीं बनाया।
नई शुरुआत पाँच टिफ़िन से हुई। इस बार पैसे हर हफ़्ते लेने थे। छुट्टी बताने का समय तय था। किसी ने कम मिर्च माँगी, किसी ने छह रोटियाँ। फ़रीदा ने सबको खुश करने की कोशिश की तो दूसरी सुबह फिर देर हो गई।
उसने अगली पर्ची पर केवल दो विकल्प रखे। लिखावट नजमा की थी। कीमत फ़रीदा ने लिखी।
पहले रविवार चार लोगों ने पैसे दे दिए। पाँचवाँ वही आदमी था, जिसने महीने के अंत में देने को कहा था। फ़रीदा ने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा कि अगला हफ़्ता शुरू करने के लिए पिछला हिसाब चाहिए।
उसने बटुआ निकाला। बात उतनी लंबी नहीं हुई, जितनी फ़रीदा ने मन में बना रखी थी।
रात को खर्च निकालकर सात सौ चालीस रुपये बचे। बड़ी रकम नहीं थी। पहिए की मरम्मत अभी पूरी नहीं निकली थी। फ़रीदा ने कॉपी में अपना हिस्सा पहली बार अलग लिखा।
माँ ने पूछा, “कल कितने?”
“सात। लेकिन अभी सात ही रखूँगी।”
सुबह वह ठेला निकालने लगी तो माँ ने पुराना कपड़े का थैला दिया। उसमें रिंच, लकड़ी का छोटा टुकड़ा और एक साफ़ रुमाल था। थैले की खुली सिलाई नई की गई थी।
फ़रीदा ने पहिए हिलाकर देखे। फिर दोनों हाथ हत्थे पर रख दिए। इस बार गली के मोड़ पर पहुँचकर भी वह उनकी आवाज़ सुन रही थी।
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