तारा की सिलाई की दुकान में पहली बार यह बात बरसात की एक सुबह हुई। मेज़ पर रखा फटा स्कूल बैग सिला मिला। धागे का रंग बिल्कुल सही था। उसने समझा, काम करके भूल गई होगी।
अगले मंगलवार किसी ने पुराने कुर्ते की जेब टाँक दी। उसके अगले मंगलवार पर्दे का उधड़ा किनारा। दुकान की चाबी सिर्फ़ तारा और मकान मालिक के पास थी। मालिक ने दोनों हाथ उठाए, “मुझे तो बटन में धागा डालना भी नहीं आता।”
तारा ने अलमारी पर आटा छिड़का। सुबह उस पर चूहे के पंजे थे, लेकिन इतनी सफ़ाई से चूहा सिलाई नहीं कर सकता था।
चौथे सोमवार उसने जानबूझकर एक आस्तीन उलटी लगाकर छोड़ी और दुकान के पीछे बैठ गई। ग्यारह बजे दरवाज़े के नीचे से नीली रोशनी आई। चौकीदार बशीर अपनी छोटी टॉर्च लेकर बैठे थे। उन्होंने खिड़की की टूटी जाली से आस्तीन खींची, उधेड़ी और सीधी लगाने लगे।
“मेरे अब्बा की दुकान थी,” पकड़े जाने पर उन्होंने कहा। “मशीन गई, दुकान गई। हाथों को कौन समझाए?”
तारा ने गौर किया—आस्तीन सीते समय उनका बायाँ हाथ अब भी कपड़े को ऐसे थामता था जैसे कोई नाज़ुक चीज़ गिरने से बचा रहा हो।
सुबह उसने बशीर को दुकान की एक चाबी दी। खिड़की के पास उनके लिए कुर्सी रखी। मेज़ पर मरम्मत के तीन कपड़े और मजदूरी लिखी पर्चियाँ थीं।
अगली सुबह तीनों पर्चियों पर निशान लगे थे। बशीर ने एक रकम काटकर बढ़ाई थी। नीचे लिखा था, “रेशम की आस्तीन के अलग लगेंगे।”
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