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Long story · Hindi

जिस पते पर कोई नहीं रहता था

बंद पड़े मकान के नाम हर हफ़्ते नई चिट्ठियाँ आती थीं, और कोई उन्हें भीतर से उठा लेता था। डाक बाँटने निकली अन्वी ने पता खोजा, तो उसके पीछे कई लोगों की अधूरी ज़िंदगी मिली।

मकान नंबर अट्ठाईस का दरवाज़ा खुलता नहीं था, मगर उसकी चिट्ठियाँ गायब हो जाती थीं।

अन्वी ने पहले इसे संयोग समझा। सोमवार को उसने बिजली के पुराने बिल के नीचे एक नीला लिफ़ाफ़ा सरकाया था। मंगलवार को दोनों नहीं थे। दरवाज़े की धूल वैसी ही थी; पीतल की कुंडी पर मकड़ी का जाला भी साबुत।

वह तीन हफ़्ते से इस इलाके में डाक बाँट रही थी। पिछला डाकिया बीमार था। उसने जाते समय बस इतना कहा था, “अट्ठाईस पर नाम मत देखना। नंबर देखना।”

अब उस नंबर पर अलग-अलग नाम आ रहे थे। सुनीता पाल। यूसुफ़ अंसारी। लीला देवी। एक लिफ़ाफ़े पर अंग्रेज़ी में कोई और नाम था, जिसे अन्वी ने दो बार पढ़ा। सामने के चायवाले ने बताया कि मकान सात साल से खाली है। मालिक बेंगलुरु में रहता है।

“तो चिट्ठियाँ कौन उठाता है?”

“उठती होंगी।” उसने दूध का पतीला नीचे उतार लिया।

बुधवार को एक मोटा लिफ़ाफ़ा आया। प्रेषक के स्थान पर किसी प्रशिक्षण संस्थान का नाम था। कोने पर हाथ से लिखा था: प्रवेश की अंतिम तिथि, सत्रह जून। आज चौदह थी। अन्वी ने उसे थैले में वापस रख लिया।

अगली सुबह मकान की देहरी पर लाल धागे का छोटा टुकड़ा पड़ा था। दरवाज़े के नीचे वाली लकड़ी थोड़ी चमक रही थी, जैसे उस पर कोई चीज़ बार-बार घिसती हो। उसने झुककर देखा। अंदर आँगन नहीं, अँधेरा था।

“गिरा है कुछ?”

पीछे एक बुज़ुर्ग औरत खड़ी थी। उसके हाथ में कपड़े का झोला और लंबी छतरी थी। धूप तेज़ थी।

अन्वी सीधी हुई। “आप यहाँ रहती हैं?”

“नहीं।”

“इन लोगों को जानती हैं?”

औरत की नज़र थैले से झाँकते मोटे लिफ़ाफ़े पर गई। उसने सुनीता का नाम पूछा। अन्वी ने लिफ़ाफ़ा भीतर कर लिया। औरत कुछ क्षण रुकी, फिर बिना चाय लिए चली गई।

उस दोपहर अन्वी ने अपने रजिस्टर में लिखा: प्राप्तकर्ता नहीं मिला। लिखते ही उसे बुरा लगा। प्राप्तकर्ता कहीं तो था; नहीं मिला था सिर्फ़ उसे।

शुक्रवार को उसने चायवाले से उस औरत का पता पूछा। इस बार उसने सड़क पार की सीढ़ियाँ दिखाईं। “ऊपर सायरा आपा हैं। पहले कचहरी के बाहर अर्जियाँ लिखती थीं। घुटना खराब हुआ तो बैठना छोड़ दिया।”

सायरा के कमरे में मेज़ पर चौदह खाने वाला लकड़ी का डिब्बा रखा था। हर खाने में दो-तीन कागज़ थे। नामों की छोटी पर्चियाँ लगी थीं। अन्वी को सुनीता पाल का खाना तुरंत दिख गया।

मेज़ के सहारे वही छतरी थी। उसके नुकीले सिरे पर तार का मुड़ा हुआ फंदा बँधा था।

“दरवाज़े के नीचे से?” अन्वी ने पूछा।

सायरा ने सिर हिलाया। “भीतर फर्श थोड़ा ऊँचा है। धक्का दो तो लिफ़ाफ़ा लौट आता है।”

“आपने बताया क्यों नहीं?”

“तुमने पूछा था, रहती हो क्या। रहती नहीं हूँ।”

अन्वी बैठी नहीं। उसने बताया कि किसी और के पत्र यूँ उठाना मुश्किल खड़ी कर सकता है। सायरा ने बहस नहीं की। डिब्बे के पीछे से एक पुरानी कॉपी निकाली। पहले पन्ने पर चौदह हस्ताक्षर और कुछ अँगूठों के निशान थे।

ये लोग कभी अट्ठाईस के पिछवाड़े किराए पर रहते थे। मकान खाली हुआ तो कोई पुल के उस पार गया, कोई स्टेशन के पीछे। काम बदलने पर कमरे भी बदलते रहे। डाक का पता वहीं रह गया।

“बदलवाया नहीं?”

“कुछ का बदल गया। कुछ का एक जगह बदला, दूसरी जगह पुराना रहा।” सायरा ने सुनीता का खाना छुआ। “यह तीन महीने में तीसरी जगह गई है। अस्पताल में सफ़ाई करती है। शाम को प्रशिक्षण भी लेना चाहती है।”

अन्वी ने लिफ़ाफ़ा निकाला, लेकिन सायरा को नहीं दिया। “उसे बुला सकती हैं?”

सायरा ने दीवार पर टँगे फोन से नंबर मिलाया। कोई जवाब नहीं आया। उन्होंने फिर कोशिश की। इस बार बोले बिना फोन अन्वी की ओर बढ़ा दिया।

सुनीता चार बजे आई। उसकी चप्पल की एक पट्टी तार से बँधी थी। उसने पहचान दिखाई, लिफ़ाफ़ा लिया और वहीं खोलने लगी। भीतर प्रवेश का पत्र था। अगले दिन तक शुल्क जमा करना था।

“मैं सोच रही थी मेरा चयन नहीं हुआ,” उसने कहा।

सायरा उठकर पानी लेने गईं। लौटते समय उनके पैर से छतरी टकराई। उन्होंने उसे मेज़ के पीछे खिसका दिया।

अन्वी की नाराज़गी पूरी तरह गई नहीं थी। वह सोच रही थी कि पिछले तीन हफ़्तों में उसने कितने पत्र केवल दरवाज़े के नीचे डाल दिए थे। कौन-सा नाम किस चेहरे का था, उसे मालूम भी नहीं था।

अगले दिन वह सायरा के साथ चाय की दुकान पर गई। दुकान वाले ने पहले मना किया। काउंटर छोटा था, सामान बहुत। सायरा ने कहा कि चौदह लोगों की डाक के लिए पूरा मकान तो माँग नहीं रही हैं।

आख़िर दीवार पर एक बंद डिब्बे की जगह निकली। दुकान वाले की सहमति लिखी गई। अन्वी ने अपने दफ़्तर में व्यवस्था के बारे में पूछा और पते बदलवाने के लिए ज़रूरी बातें नोट कर लाई। हर व्यक्ति को अपने भेजने वालों तक नया पता पहुँचाना था। पुराने पत्रों को अलग रखकर सही हाथों तक पहुँचाने में वक़्त लगेगा।

सोमवार को सुनीता फिर आई। उसने प्रशिक्षण संस्थान के लिए नया पता खुद लिखा। दुकान का नाम लिखते समय पूछा, “शंकर में अनुस्वार कहाँ आएगा?”

चायवाले ने गीला हाथ पैंट पर पोंछा और बोर्ड की तरफ़ इशारा किया।

अन्वी ने अट्ठाईस के लिए बचे दो लिफ़ाफ़े अलग किए। एक पर लौटाने की मुहर लगेगी। दूसरे का आदमी गुरुवार को आएगा। सायरा ने उसकी खबर भेज दी थी।

जाते समय अन्वी ने देखा, छतरी दुकान के कोने में रखी थी। उसके सिरे से तार का फंदा उतर चुका था।

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