“आज फ्रिज खाली होगा,” माँ ने रविवार की चाय रखते हुए घोषणा की।
पापा ने अख़बार के पीछे से पूछा, “पूरा?”
“नहीं, तुम्हारी पुरानी दलीलों के लिए एक खाना छोड़ दूँगी।”
सबसे पहले हरे ढक्कन वाला डिब्बा निकला। उसमें दो चम्मच छोले थे। पापा ने उन्हें पराठे की भरावन घोषित किया। बहन ने आधे नींबू को बालों के लिए बचा लिया। मैंने सूखी चटनी को देखकर कहा, “यह तो शोध का विषय है।” माँ ने शोध सीधे कूड़ेदान में भेज दिया।
फिर पीछे से एक छोटा स्टील का डिब्बा मिला। ऊपर टेप चिपका था—‘मत खोलना’।
अब सफ़ाई रुकी और जाँच शुरू हुई। पापा को शक था कि बहन का कोई सौंदर्य प्रयोग है। बहन ने कहा, “मेरी चीज़ों पर चेतावनी अंग्रेज़ी में होती है।” मैंने लिखावट पहचानने से इनकार किया।
दादी कमरे से आईं, डिब्बा देखा और बोलीं, “अच्छा, यहीं है!”
उसमें चार सौ रुपये और एक मुड़ा हुआ टिकट था।
“तीर्थ का चंदा?” पापा ने पूछा।
“सिनेमा। तुम लोगों ने फिर कहा होता कि इतनी भीड़ में कहाँ जाओगी।”
दादी अपनी सहेली के साथ दोपहर का शो देखने वाली थीं। रुपये बचाने के लिए उन्होंने पिछले महीने घर में बनी हर खराब चाय पर दस रुपये जुर्माना लगाया था।
माँ ने टिकट की तारीख़ देखी। “शो तो चालीस मिनट में है!”
दादी ने पापा को कार की चाबी दी। निकलते हुए फ्रिज की तरफ़ मुड़ीं।
“वे छोले फेंकना मत। फ़िल्म से लौटकर पराठे खाऊँगी।”
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