आसमान की सबसे ऊँची मीनार में बादलों का दर्ज़ी रहता था। सुबह उसे मौसम विभाग से नाप मिलते—पहाड़ों के लिए मोटी रजाई, समुद्र के लिए लंबी चादर, शहर के लिए तीन धूसर कोट।
बचे हुए टुकड़े वह नीचे नहीं फेंक सकता था। नियम था कि बिना पते की बारिश कहीं भी नहीं होगी। इसलिए उसने छोटी-छोटी सफ़ेद कतरनों से अपनी खिड़की भर रखी थी।
एक दोपहर एक कतरन उसकी उँगली से चिपक गई। उसमें से सीटी जैसी आवाज़ आई। दर्ज़ी ने उसे खींचा तो कान बन गए। मोड़ा तो सूँड़ निकल आई। उसने पहली बार बिना नाप का बादल सिला—एक छोटा हाथी।
हाथी खिड़की से निकलकर नीचे चला गया।
दर्ज़ी घबराया। वह सीढ़ियाँ उतरता हुआ एक सूखे कस्बे तक पहुँचा। हाथी स्कूल की छत के ऊपर खड़ा था। बच्चे अपनी कॉपियों पर उसकी तस्वीर बना रहे थे। चौकीदार बाल्टी लेकर भागा, मगर एक बूँद नहीं गिरी।
“इसे पानी चाहिए,” एक बच्ची ने कहा।
वह नल से एक मग भर लाई। बादल ने सूँड़ झुकाकर पानी पिया और छोटा-सा छींटा उसी की नाक पर छोड़ दिया।
अगली सुबह दर्ज़ी के नाम पहली चिट्ठी आई। मौसम विभाग की मुहर नहीं थी। टेढ़े अक्षरों में लिखा था, “हाथी के लिए साथी चाहिए। खरगोश चलेगा। हमारे यहाँ जगह है।”
दर्ज़ी ने चिट्ठी खिड़की पर रखी और सफ़ेद कतरनों की दराज़ खोली। सबसे लंबे दो टुकड़े उसने कानों के लिए अलग किए।
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