निशा की ट्रेन आधा घंटा देर से थी। वह नियुक्ति पत्र बार-बार पढ़ रही थी, जैसे आख़िरी पंक्ति में हिम्मत मिलने की संभावना हो। पहली नौकरी, दूसरा शहर, किसी को न जानने का डर।
बगल में बैठे आदमी ने पूछा, “ये ट्रेन भोपाल जाती है?”
उसने बिना सिर उठाए हाँ कहा। पाँच मिनट बाद उन्होंने वही सवाल पूछा। निशा झुँझलाई, फिर उनकी कलाई पर अस्पताल की पट्टी देखी।
“किसे लेने आए हैं?”
“बेटी को। उसने कहा, प्लेटफॉर्म चार पर रहना।” उन्होंने कपड़े का खाली थैला थपथपाया। “उसके लिए संतरे लाना था। दुकानदार मिला नहीं।”
निशा उन्हें फल की दुकान दिखाने उठी। आदमी ने बेंच कसकर पकड़ ली। “यहाँ से गया तो उसे कैसे मिलूँगा?”
वह अकेली गई और चार संतरे ले आई। उन्होंने पैसे दिए; उसने लिए। फिर उनके कहने पर थैले में से सबसे छोटा संतरा अपने लिए रख लिया।
ट्रेन आई तो भीड़ में एक औरत तेज़ी से उनकी ओर बढ़ी। वह बेटी थी। अस्पताल से छुट्टी के बाद पिता पहली बार अकेले बाहर आए थे।
निशा अपना बैग उठाकर डिब्बे की तरफ़ भागी। आदमी ने पुकारा, “पहुँचकर खबर देना!”
तीनों एक पल के लिए चुप हो गए। उनके पास निशा का नंबर नहीं था।
बेटी ने अपना फोन बढ़ाया। निशा ने जल्दी से नंबर दर्ज किया।
रात को नए कमरे की कुंडी लगाकर उसने लिखा, “पहुँच गई।”
जवाब आया, “पंखा चलाकर देख लेना। और संतरा बैग में भूल मत जाना।”
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